Thursday, 14 December 2017

ख्वाहिश मेरी आज भी है...

दर्द दे हद तक ए वक्त जीतने की ख्वाहिश मेरी आज भी है,
हुनरमंद हूँ ऊंची उड़ान भरने की ख्वाहिश मेरी आज भी है।

इस माँझी को इश्क  की  कश्ती व वफा का पतवार दे दो ,
दिल के समंदर में तैर जाने की ख्वाहिश मेरी आज भी है।

बदलते नहीं  जज़्बात मेरे  आमो-खास के हालात देखकर,
गुजारे सभी शराफत की जिंदगी ख्वाहिश मेरी आज भी है।

दो वक्त की रोटी की तलाश  है जो हमें बुला लाती है शहर,
वरना शुकुन से गाँव में बसने की ख्वाहिश मेरी आज भी है।

आज पीने को  पानी नही मयस्सर  तश्नगी बुझाने के लिए,
बंजर जमीन पर बाग लगाने की ख्वाहिश मेरी आज भी है।

वक्त बदल रहा है हल्के बर्तनों में ज्यादा आवाज आने लगी है,
सारे फूल एक  गुलदस्ते में सजी रहे ख्वाहिश मेरी आज भी है।

नशा कुछ और है कुँज ए शख्सियत में पैमाने मय से हटकर,
जमाने की  हलक में  मय न उतरे  ख्वाहिश मेरी आज भी है।

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          *****✍️Kunj sahu*****
                      (Teacher)
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मानवाधिकार कहाँ चली जाती है

जब बस्तर में नक्सलियों के खिलाफ,
सेना कार्यवाही को तैयार होती है,
खूंखार दहशतगर्द आतंकवादी को,
सजाए मौत  हुक्म सुनाई जाती है
तब मानवाधिकार के नुमाइंदों को गद्दारों,
व पत्थरबाजों में बेगुनाही नजर आती है,  नियम कायदे कानून के वास्ते देकर,
मानवता की बातें बढ़चढ़ बोली जाती है

ये देख भारतीय के मन से कुछ प्रश्न,
दिल और दिमाग में घर कर जाती है
जब बर्बरता पूर्वक गोली बंदूकों से,
बेगुनाहों के सीने छलनी की जाती है, मुफलिसी में जीवन जीने वालों की,
झुग्गी बस्तियों में आग लगाई जाती है, तब बेबस गरीबों की याद नही आती है,
ये मानवाधिकार तब कहाँ चली जाती है?

देश की रक्षा खातिर जवान शरहद पर,
हँसते हँसते जान न्योछावर कर जाते हैं,
पिता का स्नेह माँ का वात्सल्य संग में,
शहीद बेटे की याद में दम तोड़ जाती है,
औलाद अनाथ हो पिता को तरसती है,
पत्नी से उसकी मंगलसूत्र रूठ जाती है,
तब उस परिवार की याद नहीं आती है,
ये मानवाधिकार तब कहाँ चली जाती है?

भटकते सडकों पर मानसिक विकलांग,
जब उसेअभिशाप समझ बेघर की जातीहै
अनाथ बच्चे व गरीब दो वक्त निवाले को,
चौराहे व सिग्नल पर हाथ पसारे फिरती है
गर्भ में पल रही बेटी को जन्म से पहले तो
एक बेटी को दहेज केलिए मारदी जातीहै
तब समाजिक कुरीतियाँ याद न आती है,
ये मानवाधिकार तब कहाँ चली जाती है?

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            *****Kunj sahu *****
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ओखी...

*****ओखी *****
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गरमी के लहकत तपर्रा घाम झुलसाय,
चौमास पूरापानी त कभू सुख्खा गोखी।
जाड़ा भर सुर्रा ह हाड़ा ल कंप-कंपवाय,
दुबर ल दु अषाढ़आगे हे चकोरत ओखी।।

गोरस पियाय ले नइ कहूँ जहर ह जाय,
बइमान छांड डरय भले तन ले जोखी।
कुटुम्ब-सैना नइ कउनो ह ओला चिन्हाय,
चाबडरही ग ओहा करके कउनो ओखी।।

जोड़े दुनों हाथ तन ल खादी ले सजाए,
मारय लपरहा ह लबारी अड़बड़  चोखी।
सियानी पाए मइनखे के लहू चुहक जाए,
पाप लबारी लुकाय बर करय बड़ओखी।।

जांगर ल पेरत अपन महिनत ल पतियाए,
रापा गैंती संग हसिया कराय बड़ नोक्खी।
पछीना छींच कय माटी ले अन सिरजाए,
जीभर भाव नइ पाय काय करबे ओखी।।

कोरट-कचेहरी चक्कर म कहूँ पर जाय
सांप-छुछु कस किस्सा बन जाथे गोखी।
महिना पंदरही कइ बछर घलो बीत जाय,
टार तिथि भरकोठी जजवकील केओखी।

जंतर-मंतर,बनकट्ठा दवा उपचार बताय,
फूंकझाड़ म बने हो जबे झन हो तै दुखी।
टोना-जादू,अउ बाहरी हवा बिचार बताय,
ए लुट-खसोट करे बर ढोंगी मनकेे ओखी।

सरकारी कारज कराय पछिना छूट जाय,
बिन पइसा कौड़ी गोठ ल कोन समोखी ।
मइनखे ल दफ्तर दफ्तर अड़बड़ नचवाय,
ए हरे साहब बाबू के घुस खाय के ओखी।

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     *****✍️ Kunj Sahu ✍️*****
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किसान के अंतस के पीरा...

बछर कइ बछर कारी बदरिया हर संगी,
देखव न कइसे बरसे ल बिसरावत हे,
नदिया झिरिया तरिया खेती खार अउ,
गांव के बोरिंग कुआँ तको ह सुखावत हे।

खेती किसानी ल कइसे करबो कहिके,
सियनहा मुड़ धरे सरग ल निहारत हे,
पेट बर पसिया न तन ढा़के बर फरिया,
दुबर ल दु अषाढ़ मंहगई ह रोवावत हे।

बाबू बिन चाकरी के नोनी हावय सग्यान,
अपन दीनदशा ल देख मुड़ी ह पिरावत हे,
आंसो के बछर भांवर परा देतेंव बेटी के,
दाइज़ के जमाना म गरीबी ह बिजरावत हे

जम्मो जीनिस के अड़बड़ भाव आगर हे,  किसान के दाना माटी के मोल बेचावत हे,  पाइ पाइ बर साग भाजी के मोल करत हे,
दुनिया के रीति ल देखआँखी डबडबावत हे,

कते मेरा देखाय जाके वोअंतस के पीराल,
सुख भाग म नइहे वोतो दुख ल लुकावतहे धरती के हिरदे ल चिर सबके पेट पालेबर,
जम्मो के भला हो बिधाता ल गोहरावत हे,

टीवी पतरिका म रोज शोरसंदेशा आवत हे
साहूकारी बैंक के करजा म वो बोजावतहे
एक घव करजा म डुबके उबर नइ सकय,
खेती बेचाए के डर मा गर म फाँसी ओरमावत हे।।

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             *****कुँज साहू *****
                    (शिक्षक पं.)
                २८//११//२०१७
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गरीब तान

****गरीब तान****
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मुर्हेडी़ कसअइठत जियत हन बिन परान,
ए दुत्कारतअपनअंतस के पीरा का बतान,
न कुरिया न खेती खार न कोदोअउ धान,
ये जग हाँसी बर सिरजाएआन गरीब तान,

मया का होथे कउनो जनवाव ग सियान,
ये सुदामा बर कृष्ण कस बनव ग मितान,
नहायखोरे बर साबुन सोडा ले अइनजान
चिरहा फरिया म मर्जाद बचान गरीबतान,

उसनाय चरोटा भाजी अउ दर्रा खानपान,
झिरिया के पानी म पेट के प्यास बुझवान,
बोट के पावत ले नेता हमर बेंदरा मितान,
हमन घोटाला के पैडगरी आन गरीब तान,

बड़े बड़े शहर बाशा हमर बर सपना जान,
खायबर खपरा नइहे जनम के ररुहा आन,
हमरले भागमानी बिलई कुकुर हे भगवान,
करमलेखा के नइहे ग पहचान गरीब तान,

खलइथ म रूपिया बिन रहिथन हलाकान,
ये जिनगी भुखमरी अउ बिमारी ले परेशान
बिन पानी पसिया अउ इलाज के मरजान,
कचरा सरी लेग जही शमशान गरीब तान,

पढ़ई लिखइ करेबर तय सोच मत नदान, बीए एमए कतको हे नौकरी नइहे असान,
रोजगार करि लेतेन त माल कहाँ ले पान,
मजुरी करबो जीबो खाखछान गरीब तान,

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            *****कुँज साहू *****
                    (शिक्षक पं.)
                 ०९/१२/२०१७
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नेता जी...

आता जब चुनावी मौसम तो,
ये गली - गली बिलबिलाते हैं,
उजले खादी पोशाक के भीतर,
काले मन को छुपा कर आते हैं,

हाथ जोड़कर बडे़ नम्र भाव से,
चरणों में गिर लिपट वो जाते हैं,
घुटनों  के  बल बैठकर अक्सर,
वोटों के खातिर गिड़गिड़ाते हैं,

बात न बनते इतने से कहीं तो,
गिरगिट सा रंग बदल वो जाते हैं,
अंजान लोगों के बीच पहुंच कर
दुष्ट घड़ियाल की आँसू बहाते हैं,

काका-काकी व दीदी-जीजा तो,
किसी को माई-बाप बना जाते हैं,
अब पुरी होंगी बुनियादी सुविधाएं,
उम्मीदों का दिवास्वप्न दिखाते हैं,

कभी जात-पात,कभी धर्म पंथ तो,
बोली-भाषा के नाम पर लड़ाते हैं,
बहकावे में आकर देश की जनता,
अपनों के जानी दुश्मन बन जाते है,

साम दाम और दंड भेद अपनाकर,
कुर्सी के हकदार तो वो बन जाते हैं,
देश की एकता व अखंडता के लिए,
संविधान ग्रंथ की सौगंध खा जाते हैं

गरीब जनता जिनके दर माथा टेके,
भूले से भी अब वो याद नहीं आते हैं
बकरी के मेमने सा मिमयानें वाला,
सत्ता पाकर आँखें लाल दिखाते हैं,

करके सैकड़ों वादे देकर आश्वासन,
कर वादा खिलाफी मुकर जाते हैं,
मक्कारी गद्दारी रगरग में बसा हो,
एेसे महान मेरे देश में नेता कहलाते हैं,

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      *****✍️Kunj Sahu✍️*****
                    (Teacher)
Karesara, S/Lohara, Kabirdham
         (CG), Mb. 9993396300.
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गजल

भीड़े दोस्त दोस्त से कभी,देखने ऐसा कुश्ती न मिला,
जमाने में कृष्ण सुदामा सा,वफापरस्त दोस्ती न मिला।

सजाए धूल से घरघुंदिया,खुशी में बचपन जो खिला,
गुल्लिडंडे कन्चे का खेल,वो बिंदास मस्ती न मिला।

मेरे खामियों को दूर कर,हीरा जड़ा तराश कर शिला,
गुरू सा शिल्पकार दूजा,कोईअद्भुत हस्ती न मिला।

जीवन में शोहरत हमें ,अपनी दुआओं से गया दिला,
माँ-बाप सा कोई दूजा,मांझी वाला कश्ती न मिला।

जात पात धर्म पंथ का, जहां न शिकवा हो न गिला,
ढूंढ़ा चराग जलाकर मैं,जमाने में ऐसा बस्ती न मिला।

बांट दो चंद साड़ी कंबल,कबाब संग दो जाम पिला,
लोग बेचते हैं गैरत भी, खरीदी ऐसी सस्ती न मिला।

भ्रष्टाचार हो रहा चहुँओर,घूस से रंगा हर हाथ नीला,
नमकहलाल हैं वे लोग,जिनको मौका परस्ति न मिला।

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