जरा फुरसत से तु सोच जिन्दगी,
आखिर क्या खोया क्या पाया है।
जीवन का दस्तूर यही है,
कभी धूप तो कभी छाया है।।
पाया जो उपहार वो भूल गया,
हर पल तू दुखड़ा रोया है।
मिली जो खुशियां सहेज न पाया,
लोलुपता में जीवन बिताया है।।
जीना - जीना है कहता आया,
फिर जीना सीख न पाया है।
दुनिया के आडम्बरों में फंस कर,
तुने सारा जीवन गंवाया है।।
चितवन हरदम उद्विग्न रहा,
शांत रस में ठहर नहीं पाया है।
आएगा जीवन बड़ा उत्सव लेकर,
ये सोच हर लघु उत्सव ठुकराया है।।
धर्मों में तो धर्म बड़ा मानवता का है,
सब अपना नहीं कोई पराया है।
मुसाफिर सभी जीवन के डगर में,
ये दुनिया तो बस एक सराया है।।
कर अंतर्मन से कभी याद उन्हें,
जिसने यह अद्भूत श्रृष्टि बनाया है।
वह कण-कण में है रमा हुआ,
राम हर हृदय कुँज में समाया है।।
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***कुँज साहू ***
(शिक्षक पं.)
१०//११//२०१७
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*****सर्वाधिकार सुरक्षित है *****
*****सर्वाधिकार सुरक्षित है *****
Bahut sundar kavita hai
ReplyDeleteBahut bahut dhanywad Hemant
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