Saturday, 11 November 2017

किसान

न  कोई  बहाना  करता  हूँ,
न कोई  फसाना  गढ़ता  हूँ।
न कोई  शिकवे  दिल में है,
न  कोई  शिकायत  मढ़ता हूँ।।
धरती के  सीने  को  चीरकर,
नव पल्लवन को बीज बोता हूँ।
दगा  दे  काले  मेघ  कहीं  तो,
उसे  श्रम - कणों  से  सिंचता  हूँ।।
हर  वक्त  जीयो  और  जीने दो,
ये दिल में  भावना  करता  हूँ।
हर  जीवन  का हो  परवरिश,
विधाता  से  ये  दुवा  माँगता  हूँ।।
मैं भी तो एक  इंसान  हूँ  आखिर,
गर मैं  दुनिया  से अपनेपन की।
दिल  के  कोने  में  अरमां  सजाऊँ,
तो किसान मैं कुँज क्या बुरा चाहताहूँ।। #####################
       *****कुँज  साहू *****
               (शिक्षक पं.)
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*****सर्वाधिकार सुरक्षित है *****

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