Thursday, 14 December 2017

किसान के अंतस के पीरा...

बछर कइ बछर कारी बदरिया हर संगी,
देखव न कइसे बरसे ल बिसरावत हे,
नदिया झिरिया तरिया खेती खार अउ,
गांव के बोरिंग कुआँ तको ह सुखावत हे।

खेती किसानी ल कइसे करबो कहिके,
सियनहा मुड़ धरे सरग ल निहारत हे,
पेट बर पसिया न तन ढा़के बर फरिया,
दुबर ल दु अषाढ़ मंहगई ह रोवावत हे।

बाबू बिन चाकरी के नोनी हावय सग्यान,
अपन दीनदशा ल देख मुड़ी ह पिरावत हे,
आंसो के बछर भांवर परा देतेंव बेटी के,
दाइज़ के जमाना म गरीबी ह बिजरावत हे

जम्मो जीनिस के अड़बड़ भाव आगर हे,  किसान के दाना माटी के मोल बेचावत हे,  पाइ पाइ बर साग भाजी के मोल करत हे,
दुनिया के रीति ल देखआँखी डबडबावत हे,

कते मेरा देखाय जाके वोअंतस के पीराल,
सुख भाग म नइहे वोतो दुख ल लुकावतहे धरती के हिरदे ल चिर सबके पेट पालेबर,
जम्मो के भला हो बिधाता ल गोहरावत हे,

टीवी पतरिका म रोज शोरसंदेशा आवत हे
साहूकारी बैंक के करजा म वो बोजावतहे
एक घव करजा म डुबके उबर नइ सकय,
खेती बेचाए के डर मा गर म फाँसी ओरमावत हे।।

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             *****कुँज साहू *****
                    (शिक्षक पं.)
                २८//११//२०१७
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