Thursday, 14 December 2017

ओखी...

*****ओखी *****
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गरमी के लहकत तपर्रा घाम झुलसाय,
चौमास पूरापानी त कभू सुख्खा गोखी।
जाड़ा भर सुर्रा ह हाड़ा ल कंप-कंपवाय,
दुबर ल दु अषाढ़आगे हे चकोरत ओखी।।

गोरस पियाय ले नइ कहूँ जहर ह जाय,
बइमान छांड डरय भले तन ले जोखी।
कुटुम्ब-सैना नइ कउनो ह ओला चिन्हाय,
चाबडरही ग ओहा करके कउनो ओखी।।

जोड़े दुनों हाथ तन ल खादी ले सजाए,
मारय लपरहा ह लबारी अड़बड़  चोखी।
सियानी पाए मइनखे के लहू चुहक जाए,
पाप लबारी लुकाय बर करय बड़ओखी।।

जांगर ल पेरत अपन महिनत ल पतियाए,
रापा गैंती संग हसिया कराय बड़ नोक्खी।
पछीना छींच कय माटी ले अन सिरजाए,
जीभर भाव नइ पाय काय करबे ओखी।।

कोरट-कचेहरी चक्कर म कहूँ पर जाय
सांप-छुछु कस किस्सा बन जाथे गोखी।
महिना पंदरही कइ बछर घलो बीत जाय,
टार तिथि भरकोठी जजवकील केओखी।

जंतर-मंतर,बनकट्ठा दवा उपचार बताय,
फूंकझाड़ म बने हो जबे झन हो तै दुखी।
टोना-जादू,अउ बाहरी हवा बिचार बताय,
ए लुट-खसोट करे बर ढोंगी मनकेे ओखी।

सरकारी कारज कराय पछिना छूट जाय,
बिन पइसा कौड़ी गोठ ल कोन समोखी ।
मइनखे ल दफ्तर दफ्तर अड़बड़ नचवाय,
ए हरे साहब बाबू के घुस खाय के ओखी।

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     *****✍️ Kunj Sahu ✍️*****
                    (Teacher)
Karesara, S/Lohara, Kabirdham
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