जब बस्तर में नक्सलियों के खिलाफ,
सेना कार्यवाही को तैयार होती है,
खूंखार दहशतगर्द आतंकवादी को,
सजाए मौत हुक्म सुनाई जाती है
तब मानवाधिकार के नुमाइंदों को गद्दारों,
व पत्थरबाजों में बेगुनाही नजर आती है, नियम कायदे कानून के वास्ते देकर,
मानवता की बातें बढ़चढ़ बोली जाती है
ये देख भारतीय के मन से कुछ प्रश्न,
दिल और दिमाग में घर कर जाती है
जब बर्बरता पूर्वक गोली बंदूकों से,
बेगुनाहों के सीने छलनी की जाती है, मुफलिसी में जीवन जीने वालों की,
झुग्गी बस्तियों में आग लगाई जाती है, तब बेबस गरीबों की याद नही आती है,
ये मानवाधिकार तब कहाँ चली जाती है?
देश की रक्षा खातिर जवान शरहद पर,
हँसते हँसते जान न्योछावर कर जाते हैं,
पिता का स्नेह माँ का वात्सल्य संग में,
शहीद बेटे की याद में दम तोड़ जाती है,
औलाद अनाथ हो पिता को तरसती है,
पत्नी से उसकी मंगलसूत्र रूठ जाती है,
तब उस परिवार की याद नहीं आती है,
ये मानवाधिकार तब कहाँ चली जाती है?
भटकते सडकों पर मानसिक विकलांग,
जब उसेअभिशाप समझ बेघर की जातीहै
अनाथ बच्चे व गरीब दो वक्त निवाले को,
चौराहे व सिग्नल पर हाथ पसारे फिरती है
गर्भ में पल रही बेटी को जन्म से पहले तो
एक बेटी को दहेज केलिए मारदी जातीहै
तब समाजिक कुरीतियाँ याद न आती है,
ये मानवाधिकार तब कहाँ चली जाती है?
######################
*****Kunj sahu *****
(Teacher)
Karesara, S/Lohara,
Kabirdham (C.G.)
Mb. 9993396300
######################
All copyrights are reserved.
सेना कार्यवाही को तैयार होती है,
खूंखार दहशतगर्द आतंकवादी को,
सजाए मौत हुक्म सुनाई जाती है
तब मानवाधिकार के नुमाइंदों को गद्दारों,
व पत्थरबाजों में बेगुनाही नजर आती है, नियम कायदे कानून के वास्ते देकर,
मानवता की बातें बढ़चढ़ बोली जाती है
ये देख भारतीय के मन से कुछ प्रश्न,
दिल और दिमाग में घर कर जाती है
जब बर्बरता पूर्वक गोली बंदूकों से,
बेगुनाहों के सीने छलनी की जाती है, मुफलिसी में जीवन जीने वालों की,
झुग्गी बस्तियों में आग लगाई जाती है, तब बेबस गरीबों की याद नही आती है,
ये मानवाधिकार तब कहाँ चली जाती है?
देश की रक्षा खातिर जवान शरहद पर,
हँसते हँसते जान न्योछावर कर जाते हैं,
पिता का स्नेह माँ का वात्सल्य संग में,
शहीद बेटे की याद में दम तोड़ जाती है,
औलाद अनाथ हो पिता को तरसती है,
पत्नी से उसकी मंगलसूत्र रूठ जाती है,
तब उस परिवार की याद नहीं आती है,
ये मानवाधिकार तब कहाँ चली जाती है?
भटकते सडकों पर मानसिक विकलांग,
जब उसेअभिशाप समझ बेघर की जातीहै
अनाथ बच्चे व गरीब दो वक्त निवाले को,
चौराहे व सिग्नल पर हाथ पसारे फिरती है
गर्भ में पल रही बेटी को जन्म से पहले तो
एक बेटी को दहेज केलिए मारदी जातीहै
तब समाजिक कुरीतियाँ याद न आती है,
ये मानवाधिकार तब कहाँ चली जाती है?
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